यूपी के अखाड़े में क्या होगा/हो सकता है आगे?

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सम्पन्न हो चुके तीन चरणों के नुकसान की क्षति-पूर्ति आने वाले चरणों में कर पाना भाजपा के लिए संभव नहीं दिखता l पूर्वी उत्तर प्रदेश से भाजपा को काफी आशाएँ हैं लेकिन वहाँ की ग्राउंड-रिएलिटि भी भाजपा के लिए कुछ अच्छे संदेश देते नहीं दिखती l योगी आदित्यनाथ का खासा प्रभाव है पूर्व की सीटों पर और अगर सूत्रों की मानें तो खुद को उपेक्षित मान कर योगी भाजपा से रुष्ट चल रहे हैं और उनके समर्थक और उनका तंत्र भाजपा के उम्मीदवारों के प्रति उदासीन है l

पहले तीन चरणों में हुए मुस्लिम मतों के विभाजन (कोई बहुत बड़ा विभाजन नहीं) को देखते हुए पूर्वी उत्तरप्रदेश का मुस्लिम मतदाता भाजपा को किसी भी कीमत पर रोकने और बसपा-भाजपा गँठजोड़ की किसी भी संभावना को नकारने के लिए गठबंधन के पक्ष में एकमुश्त वोट करने का मूड बना चुका है l

प्रधानमंत्री जी के संसदीय क्षेत्र की ही बात की जाए तो यहाँ भी भाजपा बहुत बेहतर स्थिति में नहीं कही जा सकती l बनारस का मुसलमान सपा के समर्थन में खड़ा दिखता है l पिछड़ी जातियों के बीच (दलित को छोडकर) गठबंधन के पक्ष में बहती बयार महसूस की जा सकती है l सवर्ण मतदाताओं के बीच विभाजन देखा जा सकता है l सवर्ण पूरी तरह से भाजपा की ओर चले जाएँगे ऐसा नहीं होते दिखता l

ब्राह्मणों में भी विक्षोभ है, भूमिहारों का एक बड़ा तबका मनोज सिन्हा को तबज्जो नहीं दिए जाने के कारण मुँह-फुलाए दिखता है l वहीं साथ-साथ काँग्रेस के बाहुबली विधायक अजय राय की पकड़ भी भूमिहारों के बीच अच्छी-ख़ासी है l बनारस के छोटे व मँझोले व्यापारी तबके के बीच नोटबंदी को लेकर तमाम शिकायतें हैं l न्यूट्रल आम मतदाता पौने तीन साल के समय को कम नहीं मानते हुए बनारस के बदरंग होते रूप के सँवरने के इंतजार में मोदी जी और उनकी पार्टी के लिए शिकायतों का पुलिंदा लिए बैठा है l युवाओं के बीच अखिलेश की छवि का असर दिखता है, अस्सी घाट पर प्रोग्रेसिव दिख रहा एक युवा-समूह कहता मिला "now one can't invest hope on Modi .... this time we'll give Akhilesh another chance…"


Alok Kumar,
Senior Journalist & Analyst

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