लालू को लपेटना मात्र बहाना है; तेजस्वी निशाना है

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कोई चाहे लाख कहे कि " लालू यादव और उनके परिवार के खिलाफ जारी प्रपंच में नीतीश जी की कोई भूमिका नहीं है ". तो ये बात कम से कम मेरे गले नहीं उतरने वाली है. नीतीश कुमार और उनकी पार्टी के प्रवक्ताओं की , नीतीश जी के निर्देश पर चुप्पी , से काफी कुछ स्पष्ट है. वैसे भी हाल के वर्षों में तेजस्वी यादव के बढ़ते कद से नीतीश जी को परेशानी तो जरूर हो रही थी. युवाओं के साथ-साथ समाज का एक बड़ा वर्ग तेजस्वी की मृदुभाषी-सौम्य छवि एवं विवादरहित व् सकारात्मक स्टाइल ऑफ फंक्शनिंग से प्रभावित हो कर तेजस्वी से जुड़ता जा रहा था.

बिहार से जुड़े जनहित के मुद्दों, नयी एवं लंबित परियोजनाओं के सन्दर्भ में भी तेजस्वी केंद्र सरकार के चंद मंत्रियों व् विभागों के साथ बेहतर समन्वय कायम करते दिख रहे थे. तेजस्वी के प्रयासों के परिणाम भी परिलक्षित होते दिख रहे थे. तेजस्वी ये साबित करते हुए दिख रहे थे कि विकास के मुद्दों पर राजनीति को दरकिनार कर अगर राज्य व् केंद्र के बीच बेहतर समन्वय के गंभीर प्रयास होते हैं तो अवश्य ही 'डेड-लॉक' ख़त्म होगा और सूबे की बेहतरी के प्रयासों में कामयाबी हासिल होगी. तेजस्वी को 'माइलेज' हासिल होना ही 'स्वयंभू विकास पुरुष' के लिए नागवार था. छद्यम छवि के मोहपाश में आत्म-मुग्ध रहने वाले नीतीश कुमार को तेजस्वी का बढ़ता कद कहाँ मंजूर था. बस एक ऐसे प्रपंच की जरूरत थी जिसमें बन्दूक किसी और के कंधे पर रख कर चलानी हो. माध्यम (सुशील मोदी) विरोधी दिखने-कहलाए जाने के बावजूद भी प्रगाढ़ था/है. दिल्ली की सत्ता-शीर्ष से गलबहियों का सिलसिला भी जारी ही था/है. बस ऐन मौके का इंतजार था; ज्योंही लालू यादव ने २७ अगस्त की रैली के माध्यम से विपक्षी एकजुटता की बातें शुरू कीं, लालू परिवार पर तेजस्वी को केंद्र-बिंदु में रख कर हमले शुरू हो गए. लालू को लपेटना मात्र बहाना था/है क्यूँकि सब जानते थे/हैं कि लालू की विरासत अब तेजस्वी के हाथों में है और ऐसी किसी भी पहल का फायदा तेजस्वी को मिलेगा और विकल्प की राजनीति के किसी भी प्लेटफॉर्म पर बिहार से तेजस्वी को तरजीह मिलेगी.

वैकल्पिक फ्रंट के किसी भी प्लेटफॉर्म/प्रयास के माध्यम से खुद को प्रधानमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट किए जाने की नीतीश जी की लालसा किसी से छुपी नहीं है और लालू के प्रयासों में कांग्रेस भी शामिल है और कांग्रेस ने बार -बार ये स्पष्ट कर दिया है कि राहुल गाँधी के सिवा कोई और चेहरा उसे किसी भी सूरत में मंजूर नहीं है. ऐसी सूरत में नीतीश जी को लालू जी के प्रयासों से अपने लिए कुछ सधते नहीं दिखना और तेजस्वी यादव को राष्ट्रीय-स्तर का मंच हासिल होता दिखना कतई जँचा नहीं. ऐसे में अपना आँख फोड़ कर दूसरे की यात्रा खरमंडल करने की करतूत करते हुए नीतीश कुमार ने तेजस्वी को आगे बढ़ाने के लालू जी के प्रयासों को कुंद करने एवं तेजस्वी की छवि को धूमिल करने के लिए 'मिलीभगत' से अपनी चाल चल दी.


Alok Kumar, Senior Journalist & Analyst

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