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देशभक्ति या देशद्रोही ?

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चीन के नोबेल शांति-पुरस्कार विजेता लियू शियाओबो (Liu Xiaobo) का पिछले दिनों 61 साल की उम्र में निधन हो गया. लियू शियाबो को चीन में लोकतंत्र के समर्थन में आवाज उठाने के लिए जाना जाता है. माना जाता है कि लोकतंत्र के समर्थन में आवाज बुलंद करने के लिए चीनी सरकार ने उन्हें काफी प्रताड़ित किया. 2009 में उन्हें 11 साल जेल की सजा सुनाई गई थी. इसके साल भर बाद 2010 में उन्हें शांति का नोबेल पुरस्कार मिला. उन्हें यह सम्मान लेने नॉर्वे भी नहीं जाने दिया गया. पुरस्कार समारोह के दौरान सम्मान में उनकी कुर्सी को खाली रखा गया था.

गौर कीजिए. चीन में मानवाधिकारों या जनतान्त्रिक सरोकारों पर लिखना कितना ख़तरनाक हो सकता है? मिसाल लियू शियाओबो हैं जो मानवाधिकारों से जुड़े कई विषयों पर लिखते रहे थे. ये लेख चीन देश की कम्यूनिस्ट पार्टी के नेताओं के लिए लगातार झुंझलाहट का कारण बनते रहे. उन्हें गिरफ़्तार तब किया गया जब उन्होंने चार्टर 08 नामक एक दस्तावेज़ लिखने में योगदान दिया. इस दस्तावेज़ में चीन में शांतिपूर्ण राजनीतिक बदलाव की मांग की गई थी. इसमें कहा गया है कि शब्दों को अपराध के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए. लेकिन फिर भी उन्हें देशद्रोह के आरोप में 11 साल की जेल हुई.

शियाओबो दूसरे ऐसे नोबेल शांति पुरस्कार विजेता बन गए हैं जिनका हिरासत में निधन हुआ. इससे पहले 1938 में जर्मनी में नाजी शासन के दौरान कार्ल वोन ओसीत्जकी (Carl von Ossietzky) का निधन एक अस्पताल में हुआ था और वे भी हिरासत में थे. अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार समूहों, पश्चिम की सरकारों और स्थानीय कार्यकर्ताओं ने प्रशासन से आग्रह किया था कि शियाओबो को रिहा किया जाए. साथ ही यह भी आग्रह किया गया था कि उनकी आखिरी इच्छा के मुताबिक उपचार के लिए विदेश जाने की इजाजत दी जाए (शियाओबो लिवर कैंसर से पीड़ित थे). मगर चीन ने इन सारी मांगों को अनदेखा किया.

चीन से ही जुड़ी एक घटना और है: चार जून 1989 को थियानमेन स्क्वायर (Tiananmen Square) पर जमा हुए लोकतंत्र समर्थकों पर चीन सरकार ने सैन्य कार्रवाई कर खदेड़ा था. इसमें सैकड़ों लोगों की मौत हो गई थी. उस समय चीनी की इस कार्रवाई पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कड़ी आलोचना की गई थी. तब से लेकर आज तक चीनी सरकार बेहद सतर्कता बरतती है. वह थियानमेन स्क्वायर में पर्यटकों को आने तो देती है, लेकिन उसने इस स्थल को नरसंहार से जुड़ी किसी भी मेमोरियल में तब्दील नहीं होने दिया है. 

अब हमारे देश का हाल देखिये: पिछले साल जेएनयू के कैम्पस में छात्र संगठन के कुछ छात्रों जिनको कन्हैया कुमार और उमर खालिद लीड कर रहे थे, उन्होंने भारत की संसद के ऊपर हमले के आरोपी अफजल गुरु को सुप्रीम कोर्ट द्वारा फांसी दिए जाने के विरोध में नारे लगाए थे. जिसमें उन्होंने कहा था “अफजल हम शर्मिंदा है तेरे कातिल ज़िंदा हैं,” और “कितने अफजल मारोगे हर घर से अफजल निकलेगा” और “भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशाअल्लाह इंशाअल्लाह”.

इन देशद्रोही नारों के चलते उमर खालिद और कन्हैया कुमार को पुलिस ने गिरफ्तार भी किया था. जब ऐसा हुआ तो पूरे भारत में इन छात्र नेताओं से सहानुभूति रखने वाले विचारकों और समर्थकों ने खूब हो-हल्ला किया और टीवी चैनलों ने भी इन मुद्दों पर खूब डिबेट की. कहा जाने लगा की भारत में आपातकाल शुरू हो गया है और वर्तमान सरकार ने आजाद भारत के लोगों से बोलने की आजादी छीन ली है. विरोधियों ने सुनियोजित तरीके से सरकार को बदनाम करने की पूरी कोशिश की और इसमें बात को शह देने या गर्माने में हमारे तथाकथित सेक्युलर मीडिया का भी भरपूर योगदान रहा.

सोचिये ज़रा, अगर चीन की कम्युनिस्ट पार्टी जैसी शासन-व्यवस्था हमारे देश में होती तो देश-विरोधी नारेबाजी करने वाले इन बददिमागों का क्या हश्र हुआ होता? सच्ची और वास्तविक आज़ादी तो हमारे देश में है जिसका दुर्भाग्यवश हम मूल्य समझ नहीं पा रहे हैं. हम जिस चीन के समग्र-विकास की तारीफ़ करते अघाते नहीं हैं, उस चीन का राजनीतिक मुखौटा उतना लुभावना नहीं है. 


Dr. Shiben Krishen Raina

Currently in Ajman (UAE)

Member, Hindi Salahkar Samiti,
Ministry of Law & Justice (Govt. of India)
Senior Fellow, Ministry of Culture (Govt. of India)

Dr. Raina's mini bio can be read here: http://www.setumag.com/2016/07/author-shiben-krishen-raina.html

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