आत्मबोघ एवं कुँठा की जद्दोज़हद

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िन्हा जी का लेख बिहारियों के वर्तमान मनोदशा के चित्रण का एक ईमानदार प्रयास है (क्या बिहार द्वारा राज्य गान कि पहल अनुचित है?). परन्तु बिहारी शब्द एक गाली जैसा तब लगता है जब कोई बिहार से बाहर जाता 
है और अन्य राज्यों के लोगों से प्रतिस्प्रधा के दरम्यान उसे बिहारी सम्बोधन कर नीचा दिखाने की कोशिश की जाती है. परन्तु बिहार में ऐसे शब्द का प्रयोग अर्नथक या निर्रथक ही है.


अब रही बात बिहारी शब्द का बिहारवासियों के लिए अन्य राज्यों में उसके विशेषार्थ के साथ प्रयोग होना. इसमें कोई दो राय नही कि इसके लिए हम स्वंयम् को जिम्मेदार न मानें तो ये शुद्ध बेईमानी होगी. क्या हमने अपने 
लिय कम एसे शब्दों का ईज़ाद किया है. ई बभना.......ई कोइरिवा.......ई रजपुतवा.......यहां तक कि हम अपने बच्चों के प्रति भी अनादर सूचक शब्दों के प्रयोग में आह्लाद का अनुभव करते हैं. बड़े प्यार से नामाकरण हुआ विनोद जो हो गया विनोदवा और एसे ही लालू हो जाता है ललुआ ... विडम्बना है कि हम अपनों को तो आदर देना गंवारा नही करते किन्तु जब दूसरे हमारे लिए अनादरसूचक शब्दों का प्रयोग करते हैं तो हमारे अहम का आईना चटक जाता है. कहने का तात्पर्य है कि अच्छी एवं कर्णप्रिय भाषा के प्रयोग की आदत डाली जाय.

अपने लिए गीत या गाना बनालेने से केवल अपने अहम की क्षणिक तुष्टि के अलावा और कुछ नही होता.इसकी परणति वही होती जैसाकि उस साधू के तोते के साथ हुआ जिसे शिकारी से बचाने के लिए वह उसे एक दोहा रटाया करता था . अर्थ से अनभिज्ञ तोता रटता गया –शिकारी आएगा, जाल बिछाएगा, दाना डालेगा, लोभ से 
उसमें मत फसना- और जाल में फंसता गया. जरूरत है वास्तविक स्वाभिमान के प्राप्ति एवं संरक्षण के प्रयास की .मुझे लगता है कि इस प्रयास में दो मौलिक बाधाएँ हैं - सामाजिक व्यवस्था एवं वर्तमान राजनैतिक अवधारणा. हम जिस तात्कालिक राजनितिक सोच से सामाजिक व्यवस्था में बदलाव का प्रयास कर रहे हैं वो केवल सतही है . यह अलग बात है कि वर्तमान राजनीति उहापोह की स्थिति मे है. उसके पास न ही मौलिक कार्यक्रम है और न ही दूरगामी सोच.

बिहार को अपने स्वाभिमान के लिए एक साँस्कृतिक बदलाव की जरूरत है. साँस्कृतिक वदलाव से मेरा अभिप्राय जातिविहीन या धर्मविहीन साँस्कृतिक व्यवस्था से नही है क्योंकि ऐसे प्रयास दुनिया भर में असफल ही नही रहे हैं अपितु उनकी परिणति विनाशकारी रही है. क्योंकि भूल से इन्हे परिणाम न मानकर इनके द्वारा ही बदलाव का प्रयास किया गया.(They are ends and not means in itself). प्रश्न है कि आखिर हमें क्या करना चाहिए.......


शुरूआत के तौर पर हम लालू प्रसाद जी जैसे लोगों द्वारा प्रायोजित हिन्दी भाषा के स्वरूप के प्रयोग का यथाशक्ति विरोध करने के साथ-साथ अपने आसपास बच्चों में शुद्ध मानक हिन्दी के प्रयोग की रूचि जगाएँ. याद रखें प्रतिष्ठा न मांगने से और न ही दूसरों को भयग्रस्त कर प्राप्त की जा सकती है. इसे तो अजिर्त की जाती है.

इसमें असंभव जैसा कुछ नही है, आवश्यकता है एक ईमानदार अभियान की. चीन में एसे ही एक अभियान को हम उदाहरण के तौर पर ले सकते है.साँस्कृतिक क्राँति के दौर में वहाँ बिमारियों से लड़ने के लिए चिक्तिसक एवं प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मियों के अभाव में एसे कर्मियों को नियुक्त किया गया जिन्हे नग्नपाँव अथवा barefoot डाक्टर कहा गया. उन्हे केवल ग्रामीण स्तर पर प्रत्येक घर एवं आसपास केवल सफाई सुनिश्चित करने को कहा गया. क्या बिहार में ऐसा नही हो सकता....? हो सकता है लेकिन कुछ कड़ुवे घूँट लेने पड़ेंगे. गंदगी, अतिक्रमण, लोकस्थलों का बेतरतीब रखरखाव हमारी प्रतिष्ठा बढ़ाने में कितना योगदान देते हैं कहने की ज़रूरत नही.


एक बिहारी होने के नाते बुरा तो लगता है लेकिन एक बार गाँव पहुँचने का अनुभव लोगों के निरादर से उठी कुँठा में सत्य का बोघ कराने लगता है. किस बात पर अभिमान करें कभी-कभी सोचना पड़ता है.एताहिसिक तथा भौगोलिक परिस्तियाँ बदल चुकी है. बिहार भौगोलिक रूप में सिमट गया है और इसके गौरव की धरोहर छिन्न-भिन्न प्रतीत होती है. ऐतिहासिक एवं सास्कृतिक गौरव के ढेर में तो अपने ही पलीता लगाने पर तुले हैं. ईतिहास को छेड़ना तो मधुमक्खी के छत्ते में कंकर मारने के समान है.


बिहारी शब्द का इसके विशेषार्थ के साथ एक बड़े भौगोलिक क्षेत्र के वासियों के लिए प्रयोग किया जाता है और पड़ोसी होने के नाते हमें भी इसका खामियाज़ा भुगतना पड़ता है. इसके लिए व्यापक एवं समग्र सोच की आवश्यकता है. फिर भी .....कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी ......दौरे रहा है दुश्मन सारा जहां हमारा.


S. S. Thakur, Guest Contributor, PatnaDaily.Com

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