दीवार पर लिक्खी बात

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बात दीवार पर स्पष्ट लिक्खी हुई है.  कुछ लोगों को वह नज़र नहीं आती.  कुछ जो देखते हैं, वे उसे पढ़ नहीं पाते.  बाकी बचे लोग पढ़ लेते हैं तो उसका मतलब उन्हें पल्ले नहीं पड़ता.

सुनिए, हिंदुस्तान बदल गया है – अब यह वह हिंदुस्तान नहीं रहा जहाँ अराजकता उसके नस्ल का हिस्सा बन गयी थी.  वैसे कुछ अराजकता अभी भी है, पर निस्संदेह हिंदुस्तान ने अपनी दिशा बदल ली है. कुछ लोग जिनके पल्ले यह बात कुछ कुछ पड़ने लगी है, वे  नयी व्यवस्था को “अधिकारवादी लोकतंत्र” का नाम देने लगे हैं.  ज्यादातर लोग अभी भी इस भ्रम को पाले बैठे हैं की मोदी सरकार पर दबाव डालने से या कोर्ट कचहरी में मामला घसीटने से मनमोहन सिंह वाले दिन लौट आयेंगे.

अजीब बात ये है कि कुछ पत्रकार और कुछ बुद्धिजीवी भी  भी यह भ्रम पाले बैठे हैं.  ये लोग ये गाँठ बाँध लें की अब वे जो भी कर लें उनके सपने साकार नहीं होने वाले. NDTV को ख़ास तौर पर ज्यादा तकलीफ हो रही है, क्योंकि यह बदलाव उनके मौलिक सिद्धांत से १८० डिग्री विपरीत है.  एक रविश कुमार हैं जिनकी सोच बेतिया से शुरू हो कर बीरगंज तक जाते जाते ख़त्म हो जाती है. आज के पत्रकार या विश्लेषक की समझ बाटाक्लान (पेरिस हमले) से ले कर बांग्लादेश (के बेकरी वाले हमले) तक होनी चाहिए. संक्षेप में हिंदुस्तान बदल गया क्योंकि दुनिया बदल गयी.  यह तब्दीली अपरिवर्तनीय है. अब इस बदली हुई दुनिया में इस बदली हुई सोच को ले कर जीने में ही खैर है. सन्देश साफ़ है - अगर लचक नहीं दिखाई और बदली दुनिया में बदले नहीं, तो टूटना पड़ेगा.

पिछले कई दशकों में इस्लाम को कुछ लोगों ने अपनी बपौती बना ली थी, और उसे एक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर के दुनिया भर में अपनी प्रभुसत्ता कायम करने के अपने सपने को साकार करने में जुट गए थे. हर धर्म के ग्रंथों में कुछ उलूल जलूल बातें लिक्खी होती ही हैं, परन्तु आम तौर पर धार्मिक लोग इन बातों को अपने ध्यान के दायरे से बहार रखते हैं.

इस्लाम में कुछ अरब शेखों ने सियासत करने के चक्कर में इन उलटी सीधी बातों की अगवाई करने के लिए मुल्लों और मौलानाओं को पैसे देने शुरू कर दिए.  मुल्ले और मौलाना की पढाई लिखाई तो अरबी भाषा और  कुरान रटने तक ही सीमित रहती है.  उन्हें अपने मजहब का ठेकेदार और नेता बनने का मौका मिल गया तो वे मुसलमानों को अपनी गिरफ्त में ले कर हुक्म चलने लगे. 

हर धर्म के “भगवान के एजेंट” लोगों को अक्ल कम और जन-समूह पर नियंत्रण की चाह ज्यादा होती है.  हिन्दू समाज ने जाति प्रथा को ख़त्म कर के तो इस गिरफ्त को लगभग झाड दिया है.  मसीही लोग भी पश्चिमी देशों में पादडीयों के बच्चेबाज़ी के हंगामे के कारण चर्च से दूर हट गए हैं. हिदुस्तान में प्रगतिवादी मुसलमानों के बीच यह बगावत शुरू हो गयी है.

भाजपा समाज को धर्म के कुरीतियों से निकलने के लिए धर्म गुरुओं से जूझ रही है. जब लोगों को अन्धविश्वास की बेड़ियाँ लगी होती हैं तो ये भूत आसानी से नहीं उतरते. हिन्दू-प्राथमिक देश में भाजपा ने गेरुआ आवरण जरूर पहन रक्खा है पर सब भूतों को झाड़ने के बाद उसे खुद अपने पर चढ़े भूत से जूझना होगा. बहुत प्राचीन समय से चले आ रहे हिन्दू धर्म में बहुत कुरीतियां और अन्धविश्वास आ गयी हैं. हाल ही में CNN में काम करने वाला एक मुसलमान पत्रकार हिन्दू धर्म को वीभत्स दिखने के लिए हिंदुस्तान आ कर अवघड़ों के बीच जा कर मुर्दों का मांस खाया और विश्व के दूसरे देशों को यही सन्देश दिया कि यही हिन्दू धर्म का चेहरा है. दुर्भाग्यवश किसी हिन्दू बुद्धिजीवी या धर्मगुरु – यहाँ तक की विश्व हिन्दू परिषद् ने इस बात की खंडन या आलोचना नहीं की. वह समय दूर नहीं कि भाजपा को अवघडबाजी जैसे दूषित रिवाजों को बंद करना पड़ेगा और हिन्दू धर्म का आधुनिकीकरण करना पड़ेगा.

हिंदुस्तान को बदलने की बड़ी जरूरत हो चली थी.  दाएश (ISIS) ने हिंदुस्तान को दार-ए-इस्लाम बना कर देश भर में इस्लाम स्थापित कर के शरिया को कानून बनाने का सपना बेचना शुरू कर दिया था. हिंदुस्तान मात्र कुछ साल पहले जिस किस्म के प्रशासन में था, उसमें वह इस बढ़ते हुए सैलाब से खुद को नहीं बचा सकता था.  अगर कोई सोचता है कि नरेन्द्र मोदी ही इस नए प्रशासन दी रीढ़ की हड्डी है, तो यह सोच मूर्खतापूर्ण है.  अब तो जो आएगा वह मोदी की तरह ही हिंदुस्तान की नैय्या को आगे बढ़ाएगा.  हाल के समाचारों को सुन कर और विश्व भर में होने वाले पिछले कुछ सालों के परिवर्तन को देख कर अभी तक किसी के पल्ले ये बात नहीं पड़ी है तो या तो उसने रेत में सर गाड़ रक्खा है, या फिर यह निष्कर्ष उसके मानसिक क्षमता के दायरे से बाहर है.

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