Blessed are the men who hold their own by doing the bidding of their wives. That’s how Lord Shiva held his head high against an irate Goddess Parvati by appearing with a begging bowl before her kitchen in Kashi for food. Again, had Tulsidas forced himself on an unwilling Ratnavali, his wife, there would have been no Ram Charitra Manas. She chided him saying,

"अस्थि चर्म मय देह यह, ता सों ऐसी प्रीति!

नेकु जो होती राम से, तो काहे भव-भीत?"

 

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Call this country by any name, still the average Indian breaths in immortal India. Mere geographical boundary and ethnic background of an individual has never been the only attraction to any stranger of different race or community across the world who thought of visiting India or even invading it.

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We all remember the delight with which we listened to the Loha Singh Shows on the radio growing up. Prof. Rameshwar Singh Kashyap entertained and delighted a whole generation of Bhojpuriyas in his portrayal of Loha Singh, a veteran of the British Indian army reminiscing his exploits on the frontiers of Kabul (Kabul ka morcha) in his village. Almost every Bihari with gray hair remembers the cast of characters - Khaderan ko mother and Phatak Baba.

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Italo Calvino’s memorable fable, Numbers in the Dark, contains some timeless observation on the folly of the wise. A conscientious accountant comes across an error – a small error long committed time back – by the legendry Annibale De Canis, “the master of book keeping,” in a giant Italian conglomerate.

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हिन्दू धर्म की पहचाने बन बैठे लोग और संगठन जो हिन्दू धर्म रुपी थाली परोसते हैं, वह मुझे देखने और चखने में भले ही बहुत अच्छी लगे, परन्तु मैं उसे खा नहीं सकता.

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At the outset, I do not hesitate to state that today the most controversial person in India is Novjot Sidhu. His nature and actions have made him create controversies. We do not understand why this man who lives in India, is a Minister, visits Pakistan again and again, and seeks a certificate of their appreciation.

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रविवार का दिन था। सूरज की किरणें कोहरे की मोटी दीवार को काट कर धरती पर कुछ देर पहले ही पहुँची थी। और लगभग उसी समय वह अपने पापा को खोजने निकली। ‘माँ,माँ। पापा कहाँ हैँ?’

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बिहारियों के लिए एक छवि की समस्या हमेशा रही है.  अंग्रेज़ों द्वारा नील और अफीम की बाजोर खेती के कारण स्वाधीनता के पहले ही बिहार गरीबी में धकेल दिया गया था. महा आकालों में सैकड़ों की मौत होने लगी.  गाँव के गाँव लुप्त हो कर जंगलों में विलीन हो गए. इन माहौल में अँगरेजों ने सैकड़ों की संख्या में गरीबी से मारे बिहारियों को जहाज़ों में ले जा कर विश्व के सुदूर कोनों में अपने उपनिवेशों (colonies) में कराबद्ध मजदूरी (indentured labor) के लिए इस्तेमाल किया.

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मीडिया जनतंत्र का चौथा पाया माना जाता है। सही को गलत और गलत को सही कहना उसका धर्म नहीं है। उसका नैतिक धर्म है सही को सही और गलत को गलत कहना। मगर वास्तविकता यह है कि मीडिया से जुड़ा हर माध्यम किसी-न-किसी तरीके से अपनी प्रतिबद्धताओं/पूर्वग्रहों से ग्रस्त रहता है। इसीलिए पक्ष कमज़ोर होते हुए भी बड़ी चालाकी से डिबेट या खबर का रुख अपने मालिकों के पक्ष में मोड़ने में पेश-पेश रहते हैं। खबर-रूपी समोसे को आप दोने-पत्तल में भी परोसकर पेश कर सकते हैं और चांदी की प्लेट में भी। प्रश्न यह है कि मीडिया का मन रमता किस में है?

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हाल ही में इलाहाबाद का नाम बदलकर ‘प्रयागराज’ और फैजाबाद का ‘अयोध्या’ किया गया। संभवतः और नाम-परिवर्त्तन किए जाएँ। नाम-परिवर्त्तन के पीछे ‘गुलाम मानसिकता’ से छुटकारा पाने की बात कही जा रही है। यह सच है कि जब हमारा देश विदेशी आक्रान्ताओं के अधीन था तो उन आक्रान्ता-शासकों की पूरी कोशिश रही कि वे हमारी संस्कृति को अपनी संस्कृति यानी सोच,जीवनशैली आदि में रंग दें। ऐसा करने से विदेशी शासकों के  अधीनस्थ देश पर अपनी पकड़ मजबूत होती है। शिक्षा-व्यवस्था में बदलाव,भाषा में बदलाव,रीति-नीति में बदलाव आदि प्रक्रियाएं इसी का परिणाम हैं।

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On 26-27 August 2018, my wife Reeta, and I had the rare opportunity to host at our residence an eminent follower of Mohandas Gandhi, Dr. S.N.Subbarao. One of his best-known achievements was when in early 1970’s, under the guidance and leadership of Lok Nayak Jayaprakash Narayan, he founded the Mahatma Gandhi Seva Ashram in the Chambal valley of Madhya Pradesh and brought hundreds of dacoits (professional bandits) into the mainstream.

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