अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष - आदि सन्त कवयित्री योगिनी ललद्यद

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कश्मीर की आदि सन्त कवयित्री योगिनी ललद्यद (१४वीं शती) निःसन्देह संसार की महानतम आध्यात्मिक विभूतियों में से एक थीं, जिसने अपने जीवनकाल में ही परमविभु का मार्ग खोज लिया था और ईश्वर के धाम /प्रकाशस्थान में प्रवेश कर लिया था। वह जीवनमुक्त थी तथा उसके लिए जीवन अपनी सार्थकता एवं मृत्यु अपनी भयंकरता खो चुके थे । उसने ईश्वर से एकनिष्ठ होकर प्रेम किया था और उसे अपने में स्थित पाया था (खुछुम पंडित पननि गरे)।

कश्मीर की आदि सन्त कवयित्री योगिनी ललद्यद (१४वीं शती) निःसन्देह संसार की महानतम आध्यात्मिक विभूतियों में से एक थीं, जिसने अपने जीवनकाल में ही परमविभु का मार्ग खोज लिया था और ईश्वर के धाम /प्रकाशस्थान में प्रवेश कर लिया था। वह जीवनमुक्त थी तथा उसके लिए जीवन अपनी सार्थकता एवं मृत्यु अपनी भयंकरता खो चुके थे । उसने ईश्वर से एकनिष्ठ होकर प्रेम किया था और उसे अपने में स्थित पाया था (खुछुम पंडित पननि गरे)।

ललद्यद को प्रारम्भिक शिक्षा-दीक्षा अपने कुल-गुरु श्री सिद्धमोल से प्राप्त हुई। सिद्धमोल ने उसे धर्म, दर्शन, ज्ञान और योग सम्बन्धी विभिन्न ज्ञातव्य रहस्यों से अवगत कराया तथा गुरुपद का अपूर्व गौरव प्राप्त कर लिया। अपनी पत्नी में बढ़ती हुई विरक्ति को देखकर एक बार सोनपंडित ने सिद्धमोल से प्रार्थना की कि वे लल द्यद को ऐसी उचित शिक्षा दें जिससे वह सांसारिकता में रुचि लेने लगे। कहते हैं कि सिद्धमोल स्वयं लल द्यद के घर गये। उस समय सोनपण्डित भी वहाँ पर मौजूद थे। इससे पूर्व कि गुरुजी लल द्यद को सांसारिकता का पाठ पढ़ाते, एक गम्भीर चर्चा छिड़ गई। चर्चा का विषय था- १. सभी प्रकाशों में कौन-सा प्रकाश श्रेष्ठ है, २. सभी तीर्थों में कौन-सा तीर्थ श्रेष्ठ है, ३. सभी परिजनों में कौन-सा परिजन श्रेष्ठ है, और ४. सभी सुखद वस्तुओं में कौन-सी वस्तु श्रेष्ठ है ?

सर्वप्रथम सोनपण्डित ने अपनी मान्यता यों व्यक्त की - “सूर्य-प्रकाश से बढ़कर कोई प्रकाश नहीं है, गंगा के समान कोई तीर्थ नहीं है, भाई के बराबर कोई परिजन नहीं है, तथा पत्नी के समान और कोई सुखद वस्तु नहीं है।“

गुरु सिद्धमोल का कहना था - "नेत्र-प्रकाश के समान और कोई प्रकाश नहीं है, घुटनों के समान और कोई तीर्थ नहीं है, जेब के समान और कोई परिजन नहीं है, तथा शारीरिक स्वस्थता के समान और कोई सुखद वस्तु नहीं है।“

योगिनी लल द्यद ने अपने विचार यों रखे - "मैं अर्थात् आत्मज्ञान के समान कोई प्रकाश नहीं है, जिज्ञासा के बराबर कोई तीर्थ नहीं है, भगवान् के समान और कोई परिजन नहीं है, तथा ईश्वर-भय के समान कोई सुखद वस्तु नहीं है।“

लल द्यद का यह सटीक उत्तर सुनकर दोनों सोनपण्डित तथा सिद्धमोल अवाक् रह गये।

ललद्यद के समकालीन कश्मीर के प्रसिद्ध सूफी संत शेख नूरुद्दीन वली/नुन्द ऋषि ने कवयित्री के बारे में जो उद्गार व्यक्त किए हैं, उन से बढ़कर उस परम योगिनी के प्रति और क्या भावपूर्ण श्रद्धांजलि हो सकती है? 'उस पद्मपुर/पंपोर की लला ने दिव्यामृत छक कर पिया, वह थी हमारी अवतार प्रभु, वही वरदान मुझे भी देना।‘


ललद्यद का कोई भी स्मारक, समाधि या मंदिर कश्मीर में नहीं मिलता है। शायद वे इन सब बातों से ऊपर थीं। वे दरअसल ईश्वर (परम विभु) की प्रतिनिधि बन कर अवतरित हुर्इं और उसके फरमान को जन-जन में प्रचारित कर उसी में चुपचाप मिल गर्इं, जीवन-मरण के लौकिक बंधनों से ऊपर उठ कर: ‘मेरे लिए जन्म-मरण हैं एक समान/ न मरेगा कोई मेरे लिए/ और न ही/ मरूंगी मैं किसी के लिए!’(न मरेम कांह तअ न मरअ कांसि)


(लेखक की भुवन वाणी ट्रस्ट, लखनऊ से प्रकाशित 'ललद्यद' से उधृत .इस अनमोल पुस्तक की विद्वत्तापूर्ण भूमिका हिंदी जगत के मूर्धन्य विद्वान पद्मश्री बनारसीदास चतुर्वेदी ने लिखी है.)


shiben rainashiben rainaDr. Shiben Krishen Raina
Currently in Ajman (UAE)
Member, Hindi Salahkar Samiti,
Ministry of Law & Justice (Govt. of India)
Senior Fellow, Ministry of Culture (Govt. of India)

Dr. Raina's mini bio can be read here: 
http://www.setumag.com/2016/07/author-shiben-krishen-raina.html

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