चुप रहना मानवता और ख़ुद को शर्मसार करने जैसा

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इस जहाँ में ऐसी कोई जगह नहीं जहां सिर्फ एक जाति, एक धर्म और एक रंग के लोग रहते हो. हर जगह विविधता है. संख्या का अनुपात अलग-अलग हो सकता है.

दुनिया जब राजतंत्र को त्याग कर लोकतंत्र के रास्ते पर आगे बढ़ रही थी तब लोगों के अंदर एक अलग प्रकार का उत्साह था. आज भी यह उत्साह मध्य पूर्व देशों में देखने को मिलता है. अरब स्प्रिंग इसकी ताजातरीन उदाहरण है. 

सत्ता की नशा में राजतंत्र में भी लोगों का दमन किया जाता था. आज भी जब हम लोकतंत्र में सांसे ले रहे हैं तब भी सत्ता के नशा में सरकारों ने आम जनता का समय-समय पर दमन किया ही है. इसमें कोई शक नहीं कि लोकतंत्र का कोई विकल्प नहीं.

राजनीति और लोकतंत्र  कि समझ रखने वालों ने भी हमेशा यह बात स्वीकारा है कि लोकतंत्र के कई नकारात्मक पहलू भी हैं. डॉ. बी. आर. अंबेडकर ने भी कहा था कि संविधान महज एक  किताब साबित होगा अगर इसको लागू करने वाले लोग अधर्मी हो. भारत के इस दौर के हालात को देखकर डॉ. बी. आर. अंबेडकर की दूरदृष्टि का अंदाजा लगाया जा सकता  है.

नागरिकता संशोधन कानून भारत में लागू हो चुका है. भारत की आवाम इसके विरोध में सड़कों पर है. संपत्ति, भाईचारा और अर्थव्यवस्था की बलि चढ़ रही है.

विरोध स्वाभाविक है. नागरिकता संशोधन कानून भारत की संविधान के विपरीत है. भारत की धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद और विविधता खतरे में है. मानवता की बलि चढ़ाने की पूरी तैयारी हो चुकी है.

अनुच्छेद 370, तीन तलाक और राम मंदिर के पक्ष में  फैसले के खिलाफ विरोध नहीं हुए. क्योंकि जनता इन मुद्दों से तंग आ चुकी थी. हल पर पहुंचना जरूरी था. लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने बोतल से एक नया जिन निकाल दिया है. अब चुप रहना मानवता और ख़ुद को शर्मसार करने वाला होगा.

नागरिकता संशोधन कानून में सिर्फ 6 धर्म हिंदू, जैन, बौद्ध, सिख, ईसाई और पारसियो को रेखांकित कर देना अपने आप में यह साबित करता है कि भाजपा ध्रुवीकरण के हथकंडे छोड़ने को तैयार नहीं.

राजनीतिक पार्टियां जब शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य सेवा, भोजन और अर्थव्यवस्था ठीक नहीं कर पाती तो उनके पास सिर्फ एक ही हथियार बचता है ध्रुवीकरण का. 21 वीं सदी में भी अगर हम ध्रुवीकरण का शिकार हो रहे हैं तो यह शर्म की बात है.

सरकार की नोटबंदी की नाकामी सबने देखी. 99% के करीब जब पैसे बैंकों में जमा हो गए तो बताएं काला धन कहां था? जीएसटी ने अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी. 

नोटबंदी और जीएसटी ने मिलकर अर्थव्यवस्था की रफ्तार को बिल्कुल धीमा कर दिया. नतीजा जीडीपी के रूप में आपके सामने है. कई सारी फैक्ट्रियां और लघु उद्योग नोटबंदी की बलि चढ़ गए. लोग दवाईयों के बिना मरे सो अलग. मेक इन इंडिया भी नाकाम ही साबित हुई है.

बंगाल विधानसभा चुनाव के मद्देनजर सरकार नागरिकता संशोधन कानून लेकर आई है. हिंदू मतदाता को अपने पक्ष में लेने के लिए सरकार ने पूरे देश में आग लगा दी है.

शरणार्थी सिर्फ शरणार्थी होते हैं. नागरिकता धर्म के आधार पर नहीं दिया जा सकता. भारतीय संविधान और संयुक्त राष्ट्र दोनों इसके खिलाफ है.

बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से जितने भी लोग आए हैं. शोषित है, सताए हुए लोग हैं,  काम की तलाश में भी कुछ लोग आए हैं. उन्हें नागरिकता मिलनी चाहिए.

लेकिन सिर्फ इन्हीं तीन देशों से लोग नहीं आए हैं. बर्मा, श्रीलंका एवं नेपाल आदि से भी बहुत सारे लोग आए हैं. उन्हें भी नागरिकता मिलनी चाहिए.

नागरिकता संशोधन कानून में सिर्फ 6 धर्मों के लोगों को शामिल करने से सवाल उठता है कि क्या पाकिस्तान में अहमदिया समुदाय पर जुल्म नहीं होता? क्या बर्मा में मुसलमानों पर अत्याचार नहीं होता? क्या चीन के विगर मुसलमान शोषित नहीं है? क्या बांग्लादेश के सुधारवादी मुस्लिम परेशान नहीं है? सरकार पाकिस्तान की अहमदिया, चीन के विगर, बर्मा के रोहिंग्या और बांग्लादेश के सुधारवादी मुस्लिमों की अनदेखी क्यों कर रही है?

बांग्लादेश में कई मुस्लिम लेखकों को मौत के घाट उतार दिया गया. क्या उन सुधारवादी मुस्लिमों को शरण की जरूरत नहीं है. तस्लीमा नसरीन एक उदाहरण है जो रूढ़िवादियों की वजह से भारत में शरण ली हुई है.

मानवता और संयुक्त राष्ट्र के नियमानुसार जो भी आप की शरण में प्रताड़ित होकर आता है. उसको शरण देना है. उसकी जाति, धर्म और रंग देखकर फैसला नहीं किया जा सकता. 

यूरोप, अमेरिका और अन्य कई देशों में भी प्रवासियों को शरण दिया गया है. सीरिया और इराक जैसे देशों में उथल-पुथल के बाद वहां की जनता ने कई सारे देशों में शरण ले रखा है.

अगर भारत की तर्ज पर दुनिया शरणार्थियों को निकालना शुरू करें तो याद रखें भारत के लोग दुनिया के कोने-कोने में बसे हुए हैं. कनाडा, अमेरिका और ब्रिटेन हर जगह भारतीय फैले हुए हैं. वहां तो वे लोग चुनाव भी लड़ते हैं. उन्हें  मंत्रालय में भी शामिल किया जाता हैं. 

अभी हाल ही में ब्रिटेन में चुनाव हुआ है. यहां भारतीय मूल के 16 सांसद चुनकर आए हैं और पहले भी चुनकर गए हैं. पूर्व सरकार में प्रीति पटेल गृह मंत्री थी.

दूसरी देशों में रह रहे भारतीय दोनों देशों की बातें करते हैं. वह भारत को ही अपना मादरे वतन मानते हैं. तो क्या वहां की सरकार ने उन्हें वहां से निकाल दिया है? हाल ही में संपन्न ब्रिटेन के चुनाव में भारतीय मूल के ब्रिटिश नागरिकों को लुभाने के लिए वहां की राजनीतिक पार्टियों ने तरह-तरह की लुभावनी बातें की. ब्रिटेन में भारत के लगभग 15 लाख लोग रहते हैं.

सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए कि प्रवासी जल्दी प्रवेश ना कर पाए. जो आ चुके हैं उन्हें कहां धकेला जा सकता है.

भारतीय जनता पार्टी ने जिस तरह से हिंदू-मुस्लिम एकता की नीव बर्बाद की है. मुझे नहीं लगता यह भर पाएगा. बात-बात पर लोग तब कहां थे. अब क्यों बोल रहे हो जैसी बातें करने लगते हैं. ध्रुवीकरण की राजनीति ने ऐसे लोगों को बरगलाया है कि लोग सच सुनने को तैयार नहीं.

नेताओं की बात कौन करे, उच्च पदों पर बैठे अधिकारी भी सच सुनने को तैयार नहीं. शायद इसलिए ही तमाम सुरक्षाकर्मियों के रहते हुए बाबरी मस्जिद ढहा दी गई थी.

अल्पसंख्यकों को दिए गए अधिकारियों को लोग भेदभाव की तरह पेश करने लगे हैं. पता नहीं लोग समझ नहीं पा रहे हैं या समझना नहीं चाहते कि वह भेदभाव नहीं सुरक्षा की दृष्टि से दिया गया अधिकार है. 

हमारा देश ऐसे ही नहीं हिंदुस्तान और पाकिस्तान दो टुकड़ों में बट गया. जिस तरह आज हिंदुओं के एक बड़े तबके को गुमराह कर दिया गया है. हिंदू-मुस्लिम खुद को अलग-अलग समझने लगे हैं. उसी तरह आजादी के पूर्व भी हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग ने हिंदू-मुस्लिम को अपनी लालसा पूरी करने के लिए अपने-अपने पक्ष में खड़ा कर लिया था.

आज जिस तरह दोनों धर्मों के लोग एक दूसरे के सामने खड़े नजर आते हैं. इससे ज्यादा भयावह स्थिति तब की थी. टू नेशन थ्योरी के लिए हिंदू महासभा, मुस्लिम लीग के साथ-साथ तमाम इस तरह के छोटे-मोटे संगठन जिम्मेदार थे. सब खंडित क्षेत्र पर अपनी-अपनी हुकूमत और अपने धर्म का दबदबा  होने के सपने पाले हुए थे.

भारत के साथ खैरियत यह थी कि यहां गांधी, नेहरू, पटेल और डॉ. बी. आर अंबेडकर जैसे महान लोग रहने वाले थे जिन्होंने भारत को अपनी परंपरा के अनुरूप दुनिया के लिए एक नई मिसाल कायम करते हुए एक संगठित और विविध रूप दिया. जिसे सत्ता के लालच में राजनीतिक पार्टियां फांसी के फंदे पर लटकाने के लिए तैयार हैं.

तमाम राजनीतिक दल ध्रुवीकरण करते हैं और किया भी है. लेकिन भाजपा तो इस नंगई में सबसे आगे है. सब सत्ता का खेल चल रहा है. केंद्र सरकार को लगा था कि एनआरसी से सबसे ज्यादा मुस्लिम प्रभावित होंगे. लेकिन एनआरसी से बाहर 19 लाख लोगों में 12-13 लाख हिंदू समुदाय के लोग निकले. तब भाजपा को लगा इससे बंगाल के साथ-साथ पूरे भारत में भी हमें नुकसान हो सकता है. इसलिए एक नया मोड़ खड़ा किया गया जिसका नतीजा सबके सामने है.

सरकार को अब भी लग रहा है विरोध की आग धीरे-धीरे ठंडी हो जाएगी और हम अपने मंसूबे में कामयाब हो जाएंगे. दिलचस्प बात ये है कि इस विरोध में सभी समुदाय के लोग शामिल हैं. अब देखना ये है कि सरकार अपना रुख बदलती है या चिंता की जलती हुई आग धीरे-धीरे ठंडी हो जाती है.


Md. Mustaqueem, MA in Communication, Doon University, Dehradun

The writer, a native of Gopalganj in Bihar, has worked as a special correspondent to the Indian Plan magazine in Uttrakhand and is currently working as a teacher in a government middle school in Siwan district of Bihar.

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