Democracy is the best form of governance, more so, because the significant part of this form of government is: it is of the people, by the people and for the people. Essentially it is a government comprised of common people chosen by common people.

हिंदी-दिवस अथवा हिंदी-सप्ताह आदि मनाने के दिन निकट आ रहे हैं। सरकारी कार्यालयों में, शिक्षण-संस्थाओं में, हिंदी-सेवी संस्थाओं आदि में हिंदी को लेकर भावपूर्ण भाषण व व्याख्यान, निबन्ध-प्रतियोगिताएं, कवि-गोष्ठियां, पुरस्कार-वितरण आदि समारोह धडल्ले से होंगे। मगर प्रश्न यह है कि इस तरह के आयोजन पिछले पैंसठ-सत्तर सालों से होते आ रहे हैं, क्या हिंदी को हम वह सम्मानजनक स्थान दिला सके हैं जिसका संविधान में उल्लेख है?

भारत के भीड़ तंत्र, ख़ास तौर पर अपने गुरुओं पर अपार आस्था रखने वाले श्रद्धालुओं की मानसिकता की थाह लेना सरल कार्य नहीं है। जाने यह सबक इन श्रद्धालुओं ने कहां से सीख लिया है कि दुष्कर्म करने वाले बलात्कारी और कानून द्वारा घोषित अपराधी के पक्ष में खड़े हो जाओ, आगजनी और उपद्रव करो और सत्ता को चुनौती दो। भर्त्सना अथवा निंदा करने के बजाय अपराधी के पक्ष में उतरो और सामाजिक मूल्यों और न्याय-प्रक्रिया की धज्जियां उड़ाओ।

बहुत पहले की बात है. सम्भवतः १९८० के आसपास की. मेरी पुस्तक ‘कश्मीर की श्रेष्ठ कहानियां’ राजपाल एंड संस, दिल्ली से छप रही थी. मेरा पोस्टिंग तब नाथद्वारा (उदयपुर) में था. समय निकाल कर मैं दिल्ली आया. राजपाल एंड संस में उस समय हिंदी का काम महेंद्र कुलश्रेष्ठजी देखते थे. मेरी पाण्डुलिपि के बारे में बातचीत हो जाने के बाद हम दोनों के बीच ‘पुस्तक-प्रेम’को लेकर चर्चा चली.

आज हर शिक्षित/अर्धशिक्षित/अशिक्षित की जुबां पर ये शब्द सध-से गए हैं। स्टेशन, सिनेमा, बल्ब, पावर, मीटर, पाइप आदि जाने और कितने सैकड़ों शब्द हैं जो अंग्रेजी के हैं मगर हम इन्हें अपनी भाषा के शब्द समझ कर इस्तेमाल कर रहे हैं।

चीन के नोबेल शांति-पुरस्कार विजेता लियू शियाओबो (Liu Xiaobo) का पिछले दिनों 61 साल की उम्र में निधन हो गया. लियू शियाबो को चीन में लोकतंत्र के समर्थन में आवाज उठाने के लिए जाना जाता है. माना जाता है कि लोकतंत्र के समर्थन में आवाज बुलंद करने के लिए चीनी सरकार ने उन्हें काफी प्रताड़ित किया. 2009 में उन्हें 11 साल जेल की सजा सुनाई गई थी. इसके साल भर बाद 2010 में उन्हें शांति का नोबेल पुरस्कार मिला. उन्हें यह सम्मान लेने नॉर्वे भी नहीं जाने दिया गया. पुरस्कार समारोह के दौरान सम्मान में उनकी कुर्सी को खाली रखा गया था.

इजराइल आजकल चर्चा में है. इस देश ख़ास तौर पर यहूदियों के साथ हमारे देश के मैत्रीपूर्ण संबंधों की पुरानी परम्परा रही है. दोनों देशों के बीच सौहार्दपूर्ण संबंधों को प्रगाढ़ करने वाली एक भावपूर्ण घटना आज नेट पर पढ़ने को मिली जिसे पढ़कर मन गदगद हुआ और अपने देश (भारत) की महानता पर गर्व हुआ.

इस बार की यू.ए,ई. यात्रा के दौरान शारजाह में पत्रकारिता के कार्य से जुड़े श्री ‎इमरान ‎मुजीब से मुलाक़ात करने का सुंदर योग बना। दरअसल, मुजीब साहब ने मेरे कुछ लेख ‘पटना डेली’ में देखे-पढ़े थे और उन्हें पसंद किया था। वे मूलतः बिहार से हैं और  पिछले लगभग 20 वर्षों से शारजाह से प्रकाशित होने वाले ‘गल्फ टुडे’ में स्पेशल कोरेस्पोंडेंट के पद पर कार्य कर रहे हैं। जब उन्हें यह ज्ञात हुआ कि मैं इस समय अजमान/यू.ए.ई. में हूँ तो ‘पटना डेली’ के सम्पादक से मेल द्वारा सम्पर्क कर मेरा पता दरियाफ्त किया। ‘पटना डेली’ के सम्पादक ने यह मेल मुझे फॉरवर्ड किया और इस तरह से हमारी मुलाकात का योग बन गया।

बात शिमला के इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ एडवांस स्टडी की है।"डेलविला" नाम से जो आवास मुझे आवंटित किया गया,उसमें दो फ्लैट थे। नीचे वाले फ्लैट में मैं अकेला रहता था और ऊपर वाले  फ्लैट में इंस्टिट्यूट के पूर्व अधिकारी सूद साहब अपने परिवार सहित रहते थे। पति-पत्नी, दो लड़कियाँ और एक बूढ़ी माँ। माँ की उम्र अस्सी से ऊपर रही होगी। काया काफी दुबली। कमर भी एकदम झुकी हुई। वक्त के निशान चेहरे पर साफ तौर पर दिखते थे। सूद साहब की पत्नी किसी सरकारी स्कूल में अध्यापिका थी। दो बेटियों में से एक कॉलेज में पढ़ती थी और दूसरी किसी कम्पनी में सर्विस करती थी। माँ को सभी "अम्माजी" कहते थी। मैं भी इसी नाम से उसे जानने लग गया था।