बिहार की भूमि रत्नगर्भा रही है। मानव सभ्यता के विकास के अनेक कालखडों के दौरान इस धरती ने अनेक ऐसे नायकों को जन्म दिया जिन्होंने राष्ट्र और विश्व दोनों को प्रभावित किया है।

बिहार के ऐतिहासिक पटल पर देदीप्यमान सितारों में स्वर्गीय सत्येंद्र नारायण सिन्हा जी 'छोटे साहेब' का विशिष्ट स्थान रहा है और ये उन महापुरुषों की श्रेणी में शुमार है जिनकी जीवनी उनके समकालीन इतिहास का अंग बन जाती है। उनकी सादगी, कर्तव्यनिष्ठा, सिद्धांतवादिता एवं सौभ्य, स्निग्ध, शीतल, अहंकारहीन और दर्पोदीप्त शख़्सियत बिहार के जनमानस पर अधिकार किए हुए था।

एक विराट व्यक्तित्व को चंद शब्दों के दायरे में परिभाषित करना असंभव कार्य है परन्तु आज के परिवेश में जहाँ जनता राजनीतिज्ञों के कृत्यों से क्षुब्ध है, सत्येंद्र बाबू का जीवन प्रेरणादायक ही नहीं बल्कि राजनीति का स्वर्णिम काल है जहाँ राजनेताओं के पद की नहीं उनके कद की इज़्ज़त होती थी और जहाँ मूल्यआधारित जनसेवा और राष्ट्र निर्माण के प्रति योगदान और त्याग ही राजनीति का प्रमुख उद्देश्य होता था।

इस वर्ष जहाँ कृतज्ञ बिहार इस महान स्वतंत्रता सेनानी, शिक्षाविद,  प्रखर राजनेता, भारतीय संसद के संस्थापक सदस्यों में एक, ऐतिहासिक जेपी आंदोलन के  महानायक, अविभाजित बिहार के मुख्यमंत्री और दशकों तक राज्य की राजनीति के स्तम्भ रहे सत्येंद्र नारायण सिंह की जन्म शताब्दी मना रहा है, शायद इस कालखंड में अब दूसरे सत्येंद्र बाबू ना मिले परन्तु विकसित बिहार का उनका सपना और सामाजिक लोकतंत्र तथा समतामूलक समाज के निर्माण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका स्मरणीय रहेगी। वे देश में अपनी सैद्धांतिक राजनीति के लिए चर्चित थे।

उनका विद्यार्थी जीवन इलाहाबाद में  लाल बहादुर शास्त्री जी  के सानिध्य में बीता और  शास्त्री जी के सहजता  का प्रभाव उनपर वैसा ही पड़ा जैसा अपने  दैविक गुणों वाले महान राष्ट्रवादी पिता और भारत की आज़ादी की लड़ाई के  राष्ट्रीय नायकों में शुमार  बिहार विभूति अनुग्रह बाबू की सरलता और अपने  आदरणीय राजेंद्र चाचा (देशरत्न डॉ राजेंद्र प्रसाद) के समर्पण का।

सत्येंद्र बाबू  ने बिहार की राजनीति में छठे और सातवें दशक में 'किंगमेकर' के रूप में निर्णायक भूमिका निभायी और उनके राजनीतिक समर्थन से मुख्यमंत्री बने पंडित बिनोदानंद झा ने प्रधानमंत्री नेहरू से विशेष आग्रह करके उन्हें केंद्र से बिहार लाये एवं कैबिनेट में दूसरा स्थान दिया, वस्तुतः उन दिनों उन्हें बिहार का 'डिफैक्टो' सीएम माना जाता था। 1963 में  कामराज योजना के बाद छोटे साहेब द्वारा  के. बी. सहाय को मुख्यमंत्री पद पर स्थापित करना आज तक बिहार की राजनीती के मास्टर स्ट्रोक के रूप में  माना जाता है । 

वर्ष 1966  मे तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने विदेश मंत्री और अपने करीबी सहयोगी राजा दिनेश सिंह को बिहार भेजा और सत्येंद्र बाबू से आग्रह किया की वह मुख्यमंत्री की शपथ ले, परन्तु सिद्धांत और राजनीतिक मूल्यों पर अटल विश्वास रखने वाले और ताउम्र समझौते और अवसरवाद से परहेज़ रखने वाले छोटे साहेब ने ना केवल यह प्रस्ताव ठुकरा दिया बल्कि कालांतर में वह लोकनायक जयप्रकाश  नारायण (जिनसे उनकी व्यक्तिगत   घनिष्ठा भी  थी) के   साथ आपातकाल आंदोलन में राष्ट्रीय पटल पर इंदिरा गाँधी के विरोध में महती भूमिका निभाई।  वो चाहते तो समझौता करके 10-15  वर्षों तक इंदिरा राज के दौरान बिहार का मुख्यमंत्री बने रह सकते थे, केंद्र में बड़ा ओहदा आसानी से पा सकते थे (जैसा

अनेक राजनीतिज्ञों ने किया भी जो भले जन नेता नहीं थे पर अवसरवादिता का पूर्ण लाभ लिया)  मगर सत्ता उनके पीछे दौड़ती रही और सत्येंद्र बाबू अपने कर्म पथ और सिद्धांत पर अडिग बने रहे।

एक प्रख्यात पत्रकार और लेखक (जो अभी केंद्र में मंत्री भी है) ने लिखा है की "प्रधानमंत्री चरण सिंह जी स्वयं 'छोटे साहेब' के पटना आवास पर गये और उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल में मनचाहा विभाग चुनने को कहा, परन्तु चौधरी साहेब के आग्रह को उन्होंने नहीं माना चूंकि वह निवर्तमान  प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के लिये वचनबद्ध थे जबकि उनका मधुर सम्बन्ध दोनों से ही था। उनके जनता पार्टी के सहयोगियों अटल बिहारी वाजपेयी जी, कर्पूरी जी और बी. पी. मंडल जी ने भी अनुरोध किया पर उनकी अटलता अक्षुण रही। उनका त्याग उनकी विशिष्ट पहचान जरूर बना परन्तु इससे उन्हें हुआ व्यक्तिगत राजनीतिक नुकसान जगजाहिर है। ये एक दुर्लभ गुण ही था की उनके राजनीतिक विरोधी भी उनका बेहद सम्मान करते थे और सभी से उनके व्यक्तिगत रिश्ते मधुर थे।

ऐसे कई युवा नेता जिन्हें 1960-70 के दशक में सत्येंद्र नारायण सिन्हा ने ही बिहार की राजनीति में  संरक्षण देकर आगे बढ़ाया और स्थापित किया, अवसरवादिता और समझौते करके कालांतर में केंद्र में प्रमुख पदों पर विराजमान हुए, राज्य के सीएम भी बने परन्तु वह जनमानस में आकर्षण और राजनीतिक कद के मामले में छोटे साहेब से बड़े ना बन सके।

बिहार के वर्तमान माननीय मुख्यमंत्री जी जो स्वयं जेपी आंदोलन के दौरान छात्र नेता के रूप में सत्येंद्र बाबू के करीबी थे के शब्दो में "स्व. सत्येन्द्र नारायण सिन्हा बिहार की राजनीति के स्तंभ और युवा पीढ़ी के प्रेरणास्रोत थे। छात्र आंदोलन एवं जयप्रकाश आंदोलन के समय से ही स्व. सत्येन्द्र बाबू का मार्गदर्शन और स्नेह मुझे मिलता रहा:- नीतीश कुमार"

सात बार लोकसभा सांसद, अनेक बार विधायक और राज्य के वरीय कैबिनेट मंत्री, 10 वर्षों तक लगातार केंद्रीय कैबिनेट मंत्री का दर्जा और संयुक्त राष्ट्र की अंतर्राष्ट्रीय समिति में पूरे एशिया का प्रतिनिधित्व करने के बाद जब अविभाजित बिहार के मुख्यमंत्री बनाये गये तो छोटे साहेब ने ना  मुख्यमंत्री आवास का उपयोग किया नहीं सरकारी वाहन का और ना ही लम्बे काफिले से चलते थे। 

यह सत्य है, वे संभ्रांत परिवार से आते थे, प्यार से लोगों ने उनके उपनाम में 'साहेब' लगाया था मगर वर्तमान के तथाकथित 'गरीबों के मसीहाओं' के सामने वे राजनीतिक फ़क़ीर मालूम होते है।

उन्होंने अपनी उपलब्धियां कभी बखान नहीं की पर सुर्खिओ में रही अपनी आत्मकथा में अपनी भूलें (जिनमे उनका कोई योगदान ही ना था) जरूर स्वीकार की।