यूरोपियन यूनियन का शिष्ट-मंडल जम्मू-कश्मीर में

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पिछले दिनों ईयू/योरोपियन यूनियन का एक शिष्ट-मंडल जम्मू-कश्मीर के ताजा हालात का जायज़ा लेने के लिए घाटी के दौरे पर गया था। पत्रकारों को संबोधित करते हुए शिष्ट-मंडल ने स्पष्ट शब्दों में यह रेखांकित किया है कि आर्टिकल 370 को हटाया जाना भारत देश का अपना अंदूरूनी मामला है। घाटी में हो रही आतंकी घटनाओं की सभी सदस्यों ने एकस्वर में भर्त्सना की है और अभी हाल ही में पश्चिमी बंगाल के पांच मज़दूरों की आतंकियों द्वारा की गई जघन्य हत्याओं की कड़े शब्दों में निंदा भी की है।

ब्रिटेन के एक सांसद ने तो कुलगाम में हुए इन पांच गरीब मजदूरों की हत्या पर शोक जताया और कहा कि यूरोप में हम हजारों साल तक एक-दूसरे से लड़ते रहे लेकिन अब हमने भी शांति से रहना सीख लिया है। हम यहां जानकारियां लेने पहुंचे हैं जिससे यहां के हालात को समझ सकें।

तेइस सदस्यों का यह दल घाटी में कई लोगों से मिला है और उनके विचार जानकर इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि घाटी में शांति बहाल करने की दिशा में प्रशासन द्वारा किये जा रहे प्रयास सर्वथा उचित हैं। शिष्ट-मंडल के एक सदस्य ने जब एक स्थानीय कश्मीरी युवक से बात की तो उसने बताया कि यहां इस रियासत में बहुत ज्यादा भ्रष्टाचार है। दिल्ली से जो पैसा यहाँ आता है वह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है। शिष्ट-मंडल के एक सदस्य/सांसद से इस युवक ने साफ-साफ़ कहा कि हम सब चाहते हैं कि कश्मीर में शांति बहाल हो। स्कूल-कॉलेज और अस्पताल खुलें और स्थित तुरंत सामान्य हो जाय। 

वहीं दूसरी तरफ विपक्ष ने ईयू के इस दौरे को प्रायोजित बताकर यह आरोप लगाया है कि अपने देश के जन-प्रतिनिधियों को तो सरकार ने कश्मीर जाने नहीं दिया और श्रीनगर एअरपोर्ट से लौटा दिया जबकि विदेशी प्रतिनिधि-मंडल को कश्मीर जाने की इजाजत दे दी। यह सौतीला व्यवहार क्यों? 

दरअसल, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वहां जाने को उतावले जनप्रतिनिधि ही पिछले सत्तर सालों से चली आ रही कश्मीर-समस्या के पोषक रहे हैं। अगर अनुच्छेद ३७० को हटाना इतना सरल और सहज होता तो पिछली सरकारों ने यह कदम और जोखिम क्यों नहीं उठाया? यथा-स्थितिवाद में ही उनका मन रमा और शासन चलाते रहे। देशहित और देश की अखंडता की खातिर उलझी और जटिल समस्याओं को सुलझाने में बड़े निर्णय लेने पड़ते हैं और जोखिम भी उठाने पड़ते हैं। सरकार को अंदेशा था कि यदि इन जनप्रतिनिधियों को घाटी में जाने की अनुमति दे दी गयी तो वे वहां जाकर ‘काव्य-पाठ’ करने नहीं, जनता को वर्गला-उकसा सकते हैं, उन्हें भड़का सकते हैं और घाटी में अशांति, अस्थिरता और अराजकता का माहौल बन सकता है। इसी आशंका के मद्देनजर उनको वहां जाने से रोका गया।

ध्यान से देखा जाय तो अनुछेद ३७० को न हटाए जाने के पक्ष में कश्मीर के कतिपय नेता और समाज का एक ऐसा वर्ग भी है जिसके इस अनुच्छेद के बने रहने से जुड़े अपने हित रहे हैं। लगभग तीन दशक पूर्व जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन गवर्नर श्री जगमोहन ने उस समय के पूर्व प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी को अनुच्छेद 370 के बारे में आगाह किया था कि संविधान में जोड़ा गया यह अनुच्छेद घाटी में अमीरों/सत्ताधीशों के हितों की रक्षा अधिक करता है और गरीबों के हितों की अनदेखी ज़्यादा करता है। इसी लिए प्रदेश के सत्ता और धन-लोलुप राजनेता और नौकरशाह इसे हटाने के पक्ष में कतई नहीं हैं। 

शिष्टमंडल के एक सदस्य का यह कहना बहुत मायने रखता है कि वे कई बार भारत आए हैं और यह यात्रा भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने के लिए नहीं है, बल्कि कश्मीर में जमीनी स्थिति की जानकारी प्राप्त करने के लिए है। उन्होंने कहा, 'आतंकवादी किसी भी देश को नष्ट कर सकते हैं। मैं अफगानिस्तान और सीरिया गया हूं और मैंने देखा है कि आतंकवाद ने वहां क्या हाल किया है! हम आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में भारत के साथ खड़े हैं।' 

इसके अलावा ब्रिटेन में लिबरल डेमोक्रेट पार्टी के एक अन्य सदस्य ने इस यात्रा को सच्चाई को उजागर करने वाला और 'आंखें खोलने वाला' बताया है। उन्होंने कहा, 'हम यूरोप की एक ऐसी जगह से हैं जो सालों की लड़ाई के बाद शांत है। हम भारत को दुनिया का सबसे शांतिपूर्ण देश बनता देखना चाहते हैं। इसके लिए हमें वैश्विक आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में भारत के साथ खड़े होने की जरूरत है। 

कहने की आवश्यकता नहीं है कि कश्मीर में स्थिति दिनों-दिन सामान्य होती जा रही है। पिछले दिनों लगभग साठ हज़ार कश्मीरी छात्रों ने दसवीं-बारहवीं की परीक्षा दी है। हालत खराब होते तो परीक्षाएं स्थगित न हुयी होती?


shiben rainaDr. Shiben Krishen Raina
Currently in Ajman (UAE)
Member, Hindi Salahkar Samiti,
Ministry of Law & Justice (Govt. of India)
Senior Fellow, Ministry of Culture (Govt. of India)

Dr. Raina's mini bio can be read here: 
http://www.setumag.com/2016/07/author-shiben-krishen-raina.html

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