Congress leaders in Patna celebrate their party's victory in Rajasthan, Madhya Pradesh, and Chhattisgarh.

हाल में हुए क्षेत्रीय चुनाव परिणामों से विदित है कि देश की जनता ने भाजपा को प्रताड़ना दे कर पार्टी के मुखियाओं को एक स्पष्ट सन्देश भेजा है. इस चुनाव परिणाम से मुझे तनिक भी आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि नुक्कड़ और नाई की दुकान में जो आम जनता की राजनीतिक विश्लेषण चल रही थी, उससे जनता में रोष पिछले कई महीनों से बढ़ता हुआ नज़र आ रहा था. बार बार यही इल्जाम लग रहे थे की सरकार ने कीमत पर काबू रख पाने में कोताही की और देश में नौकरियां नहीं बढीं. 

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We all remember the delight with which we listened to the Loha Singh Shows on the radio growing up. Prof. Rameshwar Singh Kashyap entertained and delighted a whole generation of Bhojpuriyas in his portrayal of Loha Singh, a veteran of the British Indian army reminiscing his exploits on the frontiers of Kabul (Kabul ka morcha) in his village. Almost every Bihari with gray hair remembers the cast of characters - Khaderan ko mother and Phatak Baba.

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हिन्दू धर्म की पहचाने बन बैठे लोग और संगठन जो हिन्दू धर्म रुपी थाली परोसते हैं, वह मुझे देखने और चखने में भले ही बहुत अच्छी लगे, परन्तु मैं उसे खा नहीं सकता.

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बिहारियों के लिए एक छवि की समस्या हमेशा रही है.  अंग्रेज़ों द्वारा नील और अफीम की बाजोर खेती के कारण स्वाधीनता के पहले ही बिहार गरीबी में धकेल दिया गया था. महा आकालों में सैकड़ों की मौत होने लगी.  गाँव के गाँव लुप्त हो कर जंगलों में विलीन हो गए. इन माहौल में अँगरेजों ने सैकड़ों की संख्या में गरीबी से मारे बिहारियों को जहाज़ों में ले जा कर विश्व के सुदूर कोनों में अपने उपनिवेशों (colonies) में कराबद्ध मजदूरी (indentured labor) के लिए इस्तेमाल किया.

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I decided to bring to the erudite readers of PD a couple of stories from the pages of history that have a lot in common except for their endings. Neither of my two stories is imaginary. They are accounts of real life events. The names of the characters in both stories are nearly the same. The interval between the two stories is 1000 years.

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देश के विभाजन के मात्र एक वर्ष बाद १९४८ में जब पाकिस्तानी जिहादियों ने कश्मीर पर हमला बोल दिया तो कश्मीर के राजा हरि सिंह के लिए यह फैसला करना आसान हो गया की कश्मीर का भविष्य हिंदुस्तान का अभिन्न हिस्सा हो जाने में ही है.  उनके बुलाने पर हिंदुस्तान की सेना ने जिहादियों के बढ़ते कदमों को रोक दिया. युद्ध-विराम के वक़्त जो जहाँ था वहीँ एक लाइन-ऑफ़-कंट्रोल बन गयी. उस दिन से आज तक कश्मीर घाटी पर पाकिस्तान भूखे कुत्ते की तरह नज़र गड़ाये बैठा है. गत ६९ सालों में भारत ने किसी और देश को मध्यस्तता करने नहीं दिया. इतने सालों बाद एकाएक चीन के दिल में कहाँ से ये सौहार्द जगा की वह अपनी मुंह लिए कश्मीर में मध्यस्तता का प्रस्ताव ले कर चला आया?

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Sino-Indian relations have never been rosy - especially after the 1962 aggression that the Chinese launched against India in retribution for India giving refuge and shelter to the Dalai Lama of Tibet. Despite that, the border with China, unlike the border with Pakistan has been less trouble prone all these years. Chinese seemed to be content with the area they had been holding and would rarely mess around with the Indian side - except for a rare overstepping of the border to keep up their reputation of being unpredictable.

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गुंडे जहरीली लता के बीज की तरह हमेशा मौके की तलाश में रहते हैं. परिस्थिति अनुकूल होने पर ये पनप कर अपना विष फैलाना शुरू करते हैं.  भाजपा ने गो रक्षा को राजनीतिक मुद्दा बना कर समाज के गुंडों को पनपने का मौका दे दिया.  अब जब गुंडे सक्रिय हो गए हैं तो मोदी जी ऊंचे मंच पर से उनकी भर्त्सना कर रहे हैं.

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बात दीवार पर स्पष्ट लिक्खी हुई है.  कुछ लोगों को वह नज़र नहीं आती.  कुछ जो देखते हैं, वे उसे पढ़ नहीं पाते.  बाकी बचे लोग पढ़ लेते हैं तो उसका मतलब उन्हें पल्ले नहीं पड़ता.

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It has been almost a decade since it happened, but the horrors of the Bush presidency seem like they happened yesterday. It was a dark age in the history of America. War profiteers turned a terrorist attack into a global crisis which resulted in severe damage to humanity – both within and without the United States.

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Media has changed substantially over the last several decades. Sadly, despite the incorporation of new and advanced technologies that changed media for the better, the noble mission of media – especially its role in a democracy, appears to have gotten lost somewhere along the way.

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