रविवार का दिन था। सूरज की किरणें कोहरे की मोटी दीवार को काट कर धरती पर कुछ देर पहले ही पहुँची थी। और लगभग उसी समय वह अपने पापा को खोजने निकली। ‘माँ,माँ। पापा कहाँ हैँ?’

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How many times have you seen crucial decisions being taken on gut and nothing else? How many times have you sat in a meeting where decisions were taken with assumptions that the target consumer would think and act like the decision makers? – ‘If I were to buy I would choose this over others. What do you think?’ Have you ever counted on the times such decisions have failed/ backfired?

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शुरु करने के पहले ही आपको यह बताना चाहेंगे कि हम बचपन से ही पुलिस वालों के जबरदस्त फैन रहें हैं। हमारे सबसे पसंदीदा पुलिस अफसरों में अमिताभ बच्चन, विनोद खन्ना, शत्रुघन सिन्हा, अक्षय कुमार, सलमान खान और अजय देवगन जैसे अभिनेताओं के द्वारा निभाए गए किरदार शामिल हैं। सिंघम से तो हम इतना प्रभावित हैं कि दोनो फिल्में कम से कम दस बार देखी होंगी। इन किरदारों से प्रभावित होना स्वाभाविक है – ये ईमानदार, कर्मठ और अच्छाई के प्रतीक के रूप में उभर कर आते हैं।

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I was traveling a few days back on Indian Railways and met with an unfortunate incident. Almost a week back, I wrote a letter to all the members of the Railway board narrating the entire incident and raising a few questions. While the letter is made public through my blog, I would like to take it to a larger audience using the platform of PatnaDaily.

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सुबह घर से बाहर निकले तो हवा को बदला हुआ पाया – आज वहमलिन नहीं थीन ही दम घोटने को लालायित। हमें आश्चर्य हुआकारण जानने की इच्छा भीहुई। उसे रोक कर पूछा – ‘ओ बावलीक्या हो गया है तुझेआज इतनी निर्मलइतनीस्वच्छ कैसे हैआज मुझे परेशान करने का मन नही कर रहा?’

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लीजिए भईहोली आ गई। जो हमें जानते हैं उन्हें पता है कियह हमारा सबसे पसंदीदा त्योहार है। बचपन से ही इस त्योहार नें हमें अपने आकर्षणपाशमें बाँध रखा है और अभी तक हमारा इससे मोहभंग नही हुआ है।

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हाल ही की बात है – हम अपने घनिष्ठ मित्र के विवाह समारोहमें सम्मिलित होकर बेंगलुरु (हम अभी भी बैंगलोर कहना ही पसंद करते हैं) से दिल्लीवापस लौटे थे। मध्यरात्रि में जब हमारा विमान दिल्ली की हवाईपट्टी पर उतर गया तोहमने उन शक्स को फोन मिलाया जो हमें नियमित रूप से टैक्सी सेवा प्रदान करते हैं।पता चला कि ड्राइवर से बात न हो पाने के कारण हमारी टैक्सी आ नही पाएगी - अत: हमेंअपना इंतजाम इस बार स्वयं ही करना पड़ेगा।

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It is not very often that I get time to ponder upon ‘Life’ and when I do I get stuck at some very basic elements. This might reflect poorly on me but the last time I tried to think about life, I got trapped by something as basic as ‘Emotion’. I realized that I do not even naively understand this simple word and yet I persisted (I have always been headstrong in that way).

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हम देख रहें हैं कि आजकल लोगों में इतिहास के प्रति रुझानबढ़ रहा है। एक हमारा समय था कि लगता था कि इतिहास से सिर्फ हमारा और कुछ गिने चुनेलोगों का ही लगाव है। हमारा लगाव इस कदर था कि ग्यारहवीं का फार्म भरते तक पिताजीने छूट दी थी कि आर्टस लें या साईंस (और इसके लिए हम उनके तहेदिल से शुक्रगुजारहैं)। पर हमने विज्ञान को चुना – सोचा इतिहास तो जो बनना था बन गया अब हमारे इतिहासबनाने का समय है।

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हिमाचल के साथ हमारा रिश्ता पुराना है – हमने अपनीइंजीनियरिंग यहीं से की है। प्राचीन इतिहास और अद्भुत सुंदरता को अपने अंदर समेटेयह धरती मानव (तथा देवों) को सदियों से आकृष्ट करते आई है। जाहिर सी बात है किहमारा परिवार भी इस देवभूमि को देखने को इच्छुक था। अभी हाल में ही उनकी यह इच्छापूरी हो गई। हमारे पिता तो एक बार हमारे साथ हिमाचल आए भी थे पर हमारी माँ एवं भाईके लिए यह भूमि नई थी।

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सच कहें तो हमें लगता है कि सोशल नेटवर्किंग’ मानव सभ्यताकी अब तक की सबसे क्रांतिकारी ईजाद है। बस कुछ सोचा ही कि वह फुर्र से हमारे जाननेवालों को पता चल जाता है। सोच तो प्रकाश से भी ज्यादा तेज हो सकती है - सोशलनेटवर्क’ उसमें भी बूस्टर लगा रहा है।

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